हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीClassic Shayari — Ghalib, Iqbal, Kabir aur Rahim
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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीइश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब', कि लगाए न लगे और बुझाए न बुझे। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीन था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीरगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल, जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीहुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया, पर याद आता है, वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीबाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे, होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीकोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती, मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यूँ रात भर नहीं आती। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीसारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा, हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलसिताँ हमारा। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीमज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीनए ज़माने के मज़हब को क्या ख़बर क्या है, यही मुल्ला, यही मस्जिद, यही अज़ां क्या है। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीकुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीतू शाहीं है, परवाज़ है काम तेरा, तेरे सामने आसमां और भी हैं। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीबुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय। — संत कबीर
हिंदीमाटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहि, एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहि। — संत कबीर
हिंदीसाईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय, मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय। — संत कबीर
हिंदीचलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय। — संत कबीर
हिंदीदुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय, जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय। — संत कबीर
हिंदीकाल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब। — संत कबीर
हिंदीनिंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय। — संत कबीर
हिंदीजब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं, प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। — संत कबीर
हिंदीरहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परी जाय। — रहीम
हिंदीरहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून, पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून। — रहीम
हिंदीबड़े बड़ाई ना करें, बड़े न बोलें बोल, रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरो मोल। — रहीम
हिंदीजिह्वा बावरी कही पडे, कवनि सुनी है बात, रहिमन सम्हारे बोलिए, कौन पराई जात। — रहीम
हिंदीजो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग, चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग। — रहीम
हिंदीरहिमन विपदा हूँ भली, जो थोरे दिन होय, हित अनहित यह जानिए, तुरत पिछानन सोय। — रहीम
हिंदीयह न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता, अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीआह को चाहिए इक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीउनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीन तू ज़मीं के लिए है, न आसमां के लिए, जहां है तेरे लिए, तू नहीं जहां के लिए। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीयक़ीं मोहकम, अमल पैहम, मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम, जिहाद-ए-ज़िन्दगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीपोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। — संत कबीर
हिंदीअति का भला न बोलना, अति की भली न चूप, अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप। — संत कबीर
हिंदीजाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान। — संत कबीर
हिंदीकस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढे बन माहि, ऐसे घटी घटी राम है, दुनिया देखे नाहि। — संत कबीर
हिंदीतिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँवन तर होय, कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, पीर घनेरी होय। — संत कबीर
हिंदीपानी केरा बुदबुदा, अस मानुष की जात, देखत ही छिप जायेगा, ज्यूं तारा परभात। — संत कबीर
हिंदीगुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय। — संत कबीर
हिंदीजहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप, जहाँ क्रोध तहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहाँ आप। — संत कबीर
हिंदीमाला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर, कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर। — संत कबीर
हिंदीबड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। — संत कबीर
हिंदीजिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ। — संत कबीर
हिंदीसाधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय, सार सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय। — संत कबीर
हिंदीकबीरा खड़ा बाज़ार में, माँगे सबकी खैर, ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। — संत कबीर
हिंदीएकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय, रहिमन मूलहि सींचिबो, फूलहि फलहि अघाय। — रहीम
हिंदीखैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मद पान, रहिमन दाबे न दबे, जानत सकल जहान। — रहीम
हिंदीछोटे मन को हम करी, कहा होत हैं दोय, रहिमन सिंधु समान को, कहा टहलनो होय। — रहीम
हिंदीरहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय, सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय। — रहीम
हिंदीहै और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयां और। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीक़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं, मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीदिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूँ, रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यूँ। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीबस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीहर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है, तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीहर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायां मुझसे, मेरी रफ़्तार से भागे है बयाबां मुझसे। — मिर्ज़ा ग़ालिब
हिंदीवतन की फ़िक्र कर नादाँ, मुसीबत आने वाली है, तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीसितारों से आगे जहाँ और भी हैं, अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीनहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर, तू शाहीं है, बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों पर। — अल्लामा इक़बाल
हिंदीमन के हारे हार है, मन के जीते जीत, कहे कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीत। — संत कबीर
हिंदीदुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारंबार, तरुवर ज्यूं पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार। — संत कबीर
हिंदीप्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय, राजा परजा जेहि रुचे, सीस देइ ले जाय। — संत कबीर
हिंदीसब धरती कागद करूं, लेखनी सब बनराय, सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाय। — संत कबीर
हिंदीरहिमन वे नर मर चुके, जे कहुं मांगन जाहि, उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहि। — रहीम
हिंदीजो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय, बारे उजियारो लगे, बढ़े अंधेरो होय। — रहीम
हिंदीरहिमन नीचन संग बसि, लखि लखि हंसे कपूत, ज्यों मैलो कपड़ो धुलो, फिर मैलो ह्वे सूत। — रहीम
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महान शायरों की असली, प्रामाणिक रचनाएं
यह collection किसी नई लिखी गई शायरी का नहीं, बल्कि मिर्ज़ा ग़ालिब, अल्लामा इक़बाल, संत कबीर और रहीम की उन मशहूर पंक्तियों का है जो पीढ़ियों से पढ़ी और सराही जाती रही हैं — हर पंक्ति सही श्रेय के साथ।
क्यों यह collection अलग है
हमारी बाकी शायरी हम खुद लिखते हैं, पर यह collection अपवाद है — यहां हर सतर asli शायर या संत की है, नाम के साथ। यह उन पाठकों के लिए है जो क्लासिक उर्दू-हिंदी साहित्य की गहराई महसूस करना चाहते हैं।